मुस्कुराहटें लब पे आये तो आये कैसे निग़ाहें इक झलक दीदार को तरसी है तुझको पाने की तिश्नगी में ये आंखे न जाने कितनी बार बन के घटाए बरसीं है मुस्कुराहटें लब पे आये तो आये कैसे निग़ाहें इक झलक दीदार को तरसी है।। बेताब निगाहें ढूंढती हैं तेरे लबों की हंसी लम्हा बगैर तेरे बिताना अब मुश्किल सा है यादें भी तेरी कुछ इस कदर काबिज है मुझ पर खुद को खुद मे ढूढना अब मुश्किल सा है बैचैन है धड़कने बिन तेरे शामें भी गुमनाम सी है मुस्कुराहटें लब पे आये तो आये कैसे निग़ाहें इक झलक दीदार को तरसी है।। मुहब्बत को जताने की कोशिशें हमने लाख की है जरूरी नहीं कि जुबां से हर बात की जाये कुछ तो ख्याल करो अनकही खामोशियों का चले भी आओ कि अब दिन का पता नहीं रातें भी तन्हा ,उदास सी है मुस्कुराहटें लब पे आये तो आये कैसे निग़ाहें इक झलक दीदार को तरसी है।।। आयुष राज "विजय"
" हक में हमारे, अपने पल कर दो - तुम संग ही बीते,ऐसे सारे कल कर दो ....✍🏻आयुष राज "विजय" (मुहब्बत का कवि हूँ, समाज को आइना भी दिखाता हूँ )