आज फिर उनसे बात हुई, लहजे दोनों के नरम थे जो एक रात पहले, शब्दो के तीर चले थे उनको समेटते हुए,एक दूसरे को पूरा सुन रहे थे बीच गलतफहमी की दीवार ढह रही थी मन के उठे तूफान थम रहे थे चलो अच्छी पहल हुई, दोनों की सहमति से कल शायद जो रिश्ते दफ़न हो जाते हमेशा के लिए उसको बनाये रखने को, इरादे दोनों के प्रबल थे आज फिर उनसे बात हुई, लहजे दोनों के नरम थे।
" हक में हमारे, अपने पल कर दो - तुम संग ही बीते,ऐसे सारे कल कर दो ....✍🏻आयुष राज "विजय" (मुहब्बत का कवि हूँ, समाज को आइना भी दिखाता हूँ )