पनपते रहे वो ख्वाब , जिनका वजूद न था मेरे कोई नही इतना , जितना तू करीब था पनपते रहे वो ख्वाब , जिनका वजूद न था प्यार का हमारे असास , इतना नाजुक न था बस अपने कौल से मुकर तू गया इश्क मे मिलते है जरर भी, इसका एहसास न था पनपते रहे वो ख्वाब , जिनका वजूद न था मेरे कोई नही इतना , जितना तू करीब था अपनी फितरत मे , फरेब न था समां पे जलने को , परवाना हो गया मै इतना भी तो बेगाना न था मेरे कोई नही इतना , जितना तू करीब था पनपते रहे वो ख्वाब , जिनका वजूद न था मेरे कोई नही इतना , जितना तू करीब था - आयुष राज ''विजय''
" हक में हमारे, अपने पल कर दो - तुम संग ही बीते,ऐसे सारे कल कर दो ....✍🏻आयुष राज "विजय" (मुहब्बत का कवि हूँ, समाज को आइना भी दिखाता हूँ )