Skip to main content

Posts

माँ

मैं एक कतरा बूंद का, है समन्दर मेरी माँ मैं परिंदा जहां का, है आसमां मेरी माँ
Recent posts

मै प्यार लिखूँगा

मैं प्यार लिखूंगा इजहार लिखूंगा..  वो पहली मुलाकात मेरे यार लिखूंगा ....  होठों पे तेरे तैरती मुस्कान लिखूंगा... 2 गालों का तेरे रंग सुर्ख लाल लिखूंगा...  मैं प्यार लिखूंगा इजहार लिखूंगा वो पहली कयामत मेरे यार लिखूंगा. तेरी कटीली आँखे तलवार लिखूँगा.. 2 इस दिल पे हुए सारे मै वार लिखूँगा....  मैं प्यार लिखूंगा इजहार लिखूंगा..  वो पहली खामोशी मेरे यार लिखूंगा ....  तेरे मेरे नैना चार लिखूँगा... 2 आँखों आँखों हुई सारी बात लिखूँगा....  मैं प्यार लिखूंगा इजहार लिखूंगा..  वो पहली कहानी मेरे यार लिखूंगा .... इक रात लिखूंगा तुम्हें मैं ख्वाब लिखूंगा.. 2 वो पूर्णिमा की चांदनी रात लिखूँगा...  मैं प्यार लिखूंगा इजहार लिखूंगा वो पहली बहार मेरे यार लिखूंगा....  महके बसंत वाली बयार लिखूँगा.. 2 सावन की पहली रिमझिम फुहार लिखूँगा...  मैं प्यार लिखूंगा इजहार लिखूंगा..  वो पहली मुलाकात मेरे यार लिखूंगा .... 2                                         ...

चलना सम्भल के...

चलना सम्भल के देखना, रस्ते की ठोकरें है लड़खड़ाए जिनके कदम,गिर है वो पड़े जिंदगी सफर है हौसलों का, ख्वाहिशों का तो फिर संघर्ष और अड़चनों से,हम क्यों डरे चलना सम्भल के देखना,रस्ते की ठोकरें है लड़खड़ाए जिनके कदम,गिर है वो पड़े ।। कुछ फैसलें जो हमने,इस सफर मे ले लिए मंजिल को जाने वाले फिर, रस्ते सरल हुये अब देखना है बस,मंजिल को गौर से थे जिनके लिए दिल मे, अरमां जगे हुये चलना सम्भल के देखना,रस्ते की ठोकरें है लड़खड़ाए जिनके कदम,गिर है वो पड़े ।। तुम हो मेरे जो फिर, किस बात से डरे मुमकिन है हर सफर, जब साथ तुम चले हो आधियां या तूफान,या पाँव मे छाले थामा है तुमने हाथ तो, बेखौफ हम लड़े चलना सम्भल के देखना,रस्ते की ठोकरें है लड़खड़ाए जिनके कदम,गिर है वो पड़े ।।                                                        आयुष राज "विजय"

फिर आज उनसे बात हुई..

आज फिर उनसे बात हुई, लहजे दोनों के नरम थे जो एक रात पहले, शब्दो के तीर चले थे उनको समेटते हुए,एक दूसरे को पूरा सुन रहे थे बीच गलतफहमी की दीवार ढह रही थी मन के उठे तूफान थम रहे थे चलो अच्छी पहल हुई, दोनों की सहमति से कल शायद जो रिश्ते दफ़न हो जाते हमेशा के लिए उसको बनाये रखने को, इरादे दोनों के प्रबल थे आज फिर उनसे बात हुई, लहजे दोनों के नरम थे। 

कुछ कहो तो...

अंदर के शोर को बाहर निकालो जिसे हर कोई सुने यू ना फिर कोई तुम पर कुछ कहे कुछ सुने।।                          आ युष राज "विजय"

नारी : तुम भाग्य विधाता हो

             हे शक्तिमयी तुम जननी तुम ही भाग्य विधाता हो हे नारी आधार प्रेम का स्नेह का निर्झर सावन हो क्षमा-दान ,बलिदान ,त्याग का सन्तोष का अपरिमित सागर हो तुम ढाल हो अपनो का तुम्ही तो जीवन दाता हो हे नारी तुम ही आदि अंत  तुम ही त्रिभुवन की धारा हो जननी तुम ही भाग्य विधाता हो... 🙏🏻                                               आयुष राज "विजय"

महामारी और भारतीय रेलवे

  विषय :- महामारी और भारतीय रेलवे 16 अप्रैल 1853,बम्बई का बोरी बंदर रेलवे स्टेशन (वर्तमान में छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस) पर हलचल और कौतूहल से भरी अनगिनत आंखे साक्षी बन रही थी ,उस परिदृश्य का जिसने भारत वासियों को रेल पटरियों तथा रेल से परिचित कराया। तब किसने सोचा था कि भारतीय रेलवे हमारी धड़कनो की तरह ,भारत के यातायात व्यवस्था की धड़कन बन जाएगी। सन् 1853 से सफर पर निकली भारतीय रेल हर क्षण अपनी गति के अनुरूप भारत के विकास को गति देती गयी।                    आज इक्कीसवीं सदीं में भारत अपने विकास की रफ्तार को तीव्र गति से आगे बढ़ा रहा है,उस विकास के रीढ़ की हड्डी है भारतीय रेल।भारत के विकास में ही नही बल्कि उसके सुख दुःख ,उत्सव, आनंद में भी भारतीय रेल तथा उसकी पटरियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। महामारी का कठिन दौर और भारतीय रेलवे -                           ...