चलना सम्भल के देखना, रस्ते की ठोकरें है लड़खड़ाए जिनके कदम,गिर है वो पड़े जिंदगी सफर है हौसलों का, ख्वाहिशों का तो फिर संघर्ष और अड़चनों से,हम क्यों डरे चलना सम्भल के देखना,रस्ते की ठोकरें है लड़खड़ाए जिनके कदम,गिर है वो पड़े ।। कुछ फैसलें जो हमने,इस सफर मे ले लिए मंजिल को जाने वाले फिर, रस्ते सरल हुये अब देखना है बस,मंजिल को गौर से थे जिनके लिए दिल मे, अरमां जगे हुये चलना सम्भल के देखना,रस्ते की ठोकरें है लड़खड़ाए जिनके कदम,गिर है वो पड़े ।। तुम हो मेरे जो फिर, किस बात से डरे मुमकिन है हर सफर, जब साथ तुम चले हो आधियां या तूफान,या पाँव मे छाले थामा है तुमने हाथ तो, बेखौफ हम लड़े चलना सम्भल के देखना,रस्ते की ठोकरें है लड़खड़ाए जिनके कदम,गिर है वो पड़े ।। आयुष राज "विजय"
" हक में हमारे, अपने पल कर दो - तुम संग ही बीते,ऐसे सारे कल कर दो ....✍🏻आयुष राज "विजय" (मुहब्बत का कवि हूँ, समाज को आइना भी दिखाता हूँ )