ठोकरें खाकर मेरे कदम जब डगमगाते है
ये फ़रिश्ता मुझे हर बार थाम लेता है
हाँ ये वही दोस्त है, जो मेरे हिस्से के भी
दुःख उठा लेता है,
खुशी के अपने पलो को,मेरे हिस्से में लाता है
अच्छा दोस्त ही हमारे भटकते कदमो को
सच्चे राह पर लाता है।।
ये फ़रिश्ता मुझे हर बार थाम लेता है।
आयुष राज "विजय"
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