अपने पर काबू ना रहा मेरा ,
बचपन जब जवानी बन गयी ,
दिल की नादानी से ,
ये कहानी बन गयी ।।
दिल घायल हुआ मेरा ,
उनकी चस्मक से ,
कुछ- कुछ हुआ दिल मे ,
उनकी दस्तक से ,
शायद वो भी आयुष की फिदाई बन गयी ,
दिल की नादानी से ,
ये कहानी बन गयी ।।
मन को शुकून ना था ,
एक तिन्श्रगी थी मन मे ,
नर्गिस मे डूबने की ,
तमन्ना थी मन मे ,
तमन्ना थी मन मे ,
चाहत वो मेरी ऐसी बन गयी ,
दिल की नादानी से ,
ये कहानी बन गयी ।।
~ आयुष राज तिवारी ~"विजय"
Comments